रोगमुक्त लंबी उम्र चाहिए, तो.... आमलकी एकादशी करे
Vastu Articles I Posted on 11-03-2025 ,06:42:06 I by:

* आमलकी एकादशी - सोमवार, 10 मार्च 2025
* पारण का समय - 06:45 से 08:13, 10 मार्च 2025
* पारण के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - 08:13
* एकादशी तिथि प्रारम्भ - 9 मार्च 2025 को 07:45 बजे
* एकादशी तिथि समाप्त - 10 मार्च 2025 को 07:44 बजे
रोगमुक्त जीवन और दीर्घायु के लिए आमलकी एकादशी का विशेष महत्व है।
इस एकादशी पर भगवान श्रीविष्णु की पूजा-अर्चना और व्रत से स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
आमलकी मतलब... आंवला को धर्मशास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है।
आंवले को भगवान श्रीविष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है और इसके हर हिस्से में ईश्वर का वास माना गया है।
धर्मग्रथों के अनुसार जो श्रद्धालु स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए आमलकी एकादशी श्रेष्ठ है।
विष्णुदेव की आराधना के लिए नियमित रूप से किए जाने वाले व्रतों में एकादशी का सर्वाधिक महत्व है।
भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए यह व्रत किया जाता है।
एक वर्ष में कुल चौबीस एकादशी होती है, लेकिन जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष कुल छब्बीस एकादशी होती है।
सभी एकादशी अलग-अलग नामों से जानी जाती है तथा इनका अलग-अलग महत्व भी होता है।
एकादशी व्रत के दिन भोजन नहीं किया जाता है, चाहे तो फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
प्रात: पवित्र स्नान के बाद देव पूजा करनी चाहिए और दिन भर यथा सम्भव- ऊँ नमो नारायणाय, का जाप करना चाहिए।
एकादशी व्रत करने से मानसिक और शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।
कम-से-कम एक वर्ष पूरा होने पर एकादशी व्रत का उद्यापन करना चाहिए।
जीवन में भोग और मोक्ष की एक साथ प्राप्ति के लिए श्रीविष्णु आराधना श्रेष्ठ है।
तिथि को लेकर भ्रमित नहीं हों, विवेक से निर्णय करें...
तिथि को लेकर अक्सर लोग परेशान हो जाते हैं क्योंकि एक तो तिथि शुरू होने और समाप्त होने का कोई निश्चित समय नहीं होता है तो दूसरा तिथियों में कमी-बढ़ोतरी होती रहती हैं। कौन सी तिथि मानी जाए, खासकर व्रत-त्योहार को लेकर, इस पर मतैक्य नहीं रहता है।
देश में कम-से-कम दो अलग तरह के पंचांग प्रचलन में हैं, जिनमें महीने के सापेक्ष एक पक्ष तो कॉमन रहता है, लेकिन दूसरे पक्ष का महीना अलग अलग रहता है। एक पंचांग का महीना अमावस समाप्त होने के बाद शुरू होता है तो दूसरे पंचांग का वही महीना पूर्णिमा समाप्त होने के बाद शुरू होता है।
तिथियों में, कोई सूर्योदय के समय जो तिथि प्रभावी हो उसे मानता है तो कोई दिनभर में जो तिथि प्रभावी हो उसे मानता है।
कौन सी तिथि पर व्रत पूजा की जाए? इसे लेकर विवेक से कार्य करना बेहतर है।
प्रदोष जैसे व्रत में, जहां रात्रि के समय का महत्व है, के लिए प्रदोष काल की प्रभावी तिथि को महत्व दिया जाना चाहिए तो दिन में की जाने वाली पूजा के लिए दिन में प्रभावी तिथि को महत्व देना चाहिए।
तिथियों की समय की गणित के चलते कई बार एकादशी व्रत दो दिन तक चलता है।
तिथि का मूल उद्देश्य उस व्रत-पूजा काल की गणना के सापेक्ष कार्य करना है इसलिए तिथि को लेकर ज्यादा भ्रम नहीं पालें, सच्चे मन से किए गए व्रत-पूजन में तिथि अंश भी मिल जाए तो व्रत-पूजा सार्थक है।
वैसे तिथि निर्धारण में स्थानीय धर्मगुरु और कुल परंपराओं के अनुरूप निर्णय लेना उत्तम रहता है।
कामयाबी के लिए नियमित रूप से विष्णुदेव की पूजा करें-
अच्युतम केशवम रामनारायणम, कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरे।
श्रीधरम् माधवम् गोपिकावल्लभम, जानकी नायकम श्रीरामचन्द्रम् भजे।।
-प्रदीप लक्ष्मीनारायण द्विवेदी, बॉलीवुड एस्ट्रो एडवाइजर